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नवंबर 12, 2017

शून्य काल










शून्य का मैं खोज हूँ 
शून्य का मैं ओज हूँ 
शून्य  के रथ पर सवार 
शून्य का मैं आज हूँ 

शून्य का कपाट हूँ 
शून्य सा विराट हूँ 
शून्य सा ही क्षुद्र मैं 
शून्य का ललाट हूँ 

अवसाद में है शून्यता 
विषाद में है शून्यता 
प्रसन्नता में शून्यता 
विपन्नता में शून्यता 

शून्य मेघ का गरज 
शून्य विद्युत सा लरज 
शून्य सूर्य सा है तप्त 
शून्य चंद्र सा है सर्द


शून्य सा प्रखर हूँ मैं
शून्य का शिखर हूँ मैं
शून्य सा हूँ मापदण्ड
शून्य सा मुखर हूँ मैं

शून्य का अलाप हूँ
शून्य का विलाप हूँ
शून्य का हूँ शब्दरूप
शून्य का संलाप हूँ

रात्रि शून्य में विलय
शून्य शनि का वलय
तारकों में टिमटिमाता
प्रकाश का महाप्रलय

शून्य में है स्तब्धता
शून्य में है क्षुब्धता
शून्य को विराम दो
कि शून्य में है गत्यता

शून्य मार्ग प्रशस्त कर
बाधाएं निरस्त कर
शत्रु को शिकस्त दे तू
धर्म को तदर्थ धर

आओ शून्य में चलें
आओ शून्य में ढलें
शून्य के आकाश में
हम ह्रस्व-दीर्घ पग भरें

नवंबर 09, 2017

हद है

अश्कों को आँखों का ठौर पसन्द नहीं
उसे पूरी दुनिया से है वास्ता, हद है

कर भी लूँ नींदों से वाबस्ता
ख़्वाब बन जाता है हरजाई हद है
 
रिंदो साक़ी ने झूम के पिलाया जो
घूँट पानी का न उतरा हद है


कर ली खूब मेहमाननवाज़ी भी हमने
हुए फिर भी बदनाम हद है

दो दिन ज़िन्दगी के चांदनी के चार दिन
बाकी ज़िन्दगी है सियापा हद है

ताश के पत्ते मानिंद बिखर जाता है घर
जो न सम्भाला तिनका भी हद है

कर ली थी मैंने इश्क़ से तौबा
उफ़्फ़ तेरी ये आंखें हद है

ये दिल भी बड़ा कमज़र्फ निकला
जान के भी इश्क़ ए दस्तूर हद है

सितंबर 18, 2017

किस्से बयाँ न हो पाता...



सारे किस्से बयाँ न हो पाता कभी
दिल के कब्र में हजार किस्से दफ़्न हैं


इतने करीब भी न थे कि बुला पाऊँ तुम्हें
इतने दूर भी न थे कि भुला पाऊँ तुम्हें


पुराने जख्मों से मिल गयी वाहवाही इतनी
कि अब उसे नये जख्मों की तलाश है


मेरी चाहत है मैं रातों को  रोया न करूं
या रब मेरी इस चाहत को तो पूरा कर दे


कई नाम मौजूद है इस दिले गुलिस्तान में
धड़क जाता है दिल ये बस तुम्हारे नाम से


मैं कुछ इस तरह ग़म की आदत से तरबतर
कि ग़म होगा गर ख़ुशी आये मिलने मुझसे 

सितंबर 13, 2017

ख्वाव तेरे किरचियाँ बन ...



ख़्वाब तेरी किरचियाँ बन आँखों को अब चुभने लगी
गम की आँधियाँ इस तरह ख्वाबों के धूल उड़ा गए


मंज़िल पास थी रास्ता साफ था दो कदम डग भरने थे
गलतफहमी की ऐसी हवा चली सारे रास्ते धुंधला गए


बड़े शिद्दत से फूलों में बहार-ए-जोबन आयी थी
वक्त के साथ मिरे गजरे के सारे फूल मुरझा गए


मुहब्बत का दम भरने को दिल ने न चाहा फिर भी
बादल,चाँद, सितारे आँखों के आगे लहरा गये

सितंबर 10, 2017

मेरी धड़कनों से..










मेरी  धड़कनों से वो ज़िंदा ...  जो हुई
ज़िंदा हुई
 क्या मुझ पे ही वो बरस पड़ी!!

देख लिया इस शहर को  जो करीब से
बोल दिया असलियत तो भीड़ उबल पड़ी !!

सम्भाला ही था आईने को सौ जतन से
काफ़िये में तंग हुई उलझन में हूँ पड़ी !!

ख़ुदाया तूने मुझको जो काबिल न बनाया
कर आसाँ फ़िलवक्त इम्तिहान की घड़ी !!

गिर पड़ा मैं अपने गुनाहों के बोझ से 
मैं नशे में हूँ ये वहम खामखाँ पड़ी !!

सितंबर 04, 2017

मशहूर हो गए


ज़िन्दगी से कुछ इतने क़रीब हुए
कि आईने से भी  हम अजनबी हुए

रोशनी जो आँखों की नजर थी
दिखाया नहीं कुछ जो बत्ती गुल हुए

आ पँहुचे है ऐसी जहाँ में हम
ना ख़ुशी से ख़ुश औ' ना ग़म से ग़म

सभी रास्तें  मिल जाते है जहाँ
उस जगह से रास्तों सा अलग हुए

अच्छे-बुरे,सही-गलत पहचान न सके
मिले सबसे इस कदर कि मशहूर हो गए 

जुलाई 22, 2017

दरवाज़ों की भी ....



हर दर के दरवाज़ों की भी अपनी कहानी होती है
कहीं बूढ़े सिसकते मिलते है और कहीँ जवानी रोती है

आंगन-खिड़की है फिर भी दरवाज़ों का अपना खम है
कोई हाथ पसारे बाहर है कोई बाँह फैलाये अंदर है

हर दरवाजे के अंदर जाने कितनी जानें बसतीं हैं
बच्चे बूढ़े और जवानों की खूब रवानी रहती  है

सूरते हाल पूछो उनसे जिसे दर दर ठोकरें ही है मिले
दरवाजे बने हैं हर घर में पर 'खुले' नसीबांओं  को मिले 

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